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खोया वैभव पुनः प्रदान करने वाले श्री सोमेश्वर महादेव (२६/८४)

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एषतो कथितो देवी प्रभावः पापनाशनः।
सोमेश्वरस्य देवस्य श्रणुष्वानरकेश्वरम्। ।

परिचय:
श्री सोमेश्वर महादेव की स्थापना की कथा प्रभु भक्ति की महत्ता दर्शाती है। स्वयं चन्द्र को भी अन्तर्धान हो जाना पड़ा एवं उन्हें भी प्रभु वंदना से ही पुनः देह एवं राज्य प्राप्त हुआ।

पौराणिक आधार एवं महत्व:
पौराणिक कथाओं के अनुसार ब्रह्माजी के मानस पुत्र अत्रि ऋषि हुए जो वराहकल्प में प्रजापति थे। उनके पुत्र सोम (चन्द्रमा) थे। सोम का विवाह दक्ष की २७ कन्याओं से हुआ था। उन कन्याओं में रोहिणी श्रेष्ठ थी। सोम रोहिणी से अधिक प्रेम करते थे। अन्य कन्याओं से उनकी उतनी प्रीति नहीं थी जितनी रोहिणी से थी। अन्य २६ कन्याओं ने इसकी शिकायत पिता दक्ष से की। दक्ष ने सोम (चन्द्रमा) को समझाने की कोशिश की लेकिन वे नहीं माने। इससे कुद्ध होकर दक्ष ने उन्हें अन्तर्धान होने का शाप दे दिया। शाप से ग्रस्त हो सोम अन्तर्धान हो गए। तब देवता, नाग, यक्ष, गन्धर्व और पितृ आदि ब्रह्माजी के पास पहुंचे और चन्द्रमा की दुर्दशा के बारे में बताया। ब्रह्माजी ने कहा कि चन्द्रमा ने अपने ही कर्म का फल पाया है। अब उसके शाप का समाधान तो केवल विष्णु ही कर सकते हैं। तब सभी देवतागण भगवान विष्णु के पास पहुँच कर उनकी स्तुति करने लगे। और फिर कहा कि प्रभु, दक्ष के शाप से चन्द्रमा अदृश्य हो गए हैं इसलिए उनके बिना औषधियां नष्ट हो रही हैं। भगवान विष्णु ने देवताओं को आश्वस्त किया और फिर चन्द्रमा का स्मरण किया, किन्तु चन्द्रमा उपस्थित नहीं हुए । तब भगवान विष्णु ने ब्रह्माजी से कहा कि आप सभी देवतागण असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करें जिससे कई रत्नों और अमृत के साथ सोम की भी प्राप्ति होगी। समुद्र मंथन के योजनानुसार मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकि नाग को रस्सी बनाकर समुद्र मंथन प्रारम्भ हुआ। समुद्र मंथन के फलस्वरूप तेजस्वी चन्द्रमा प्रकट हुए जिन्हें भगवान विष्णु ने कहा कि – हे चन्द्र तुम इस प्रजा का पालन करो। भगवान की आज्ञा पर चन्द्रमा प्रजा का पालन करने लगे।

दूसरी ओर वे चन्द्रमा जो शाप के कारण अदृश्य हो गए थे उन्हें नारद मुनि ने नए चन्द्र की उत्पत्ति का वृत्तांत सुनाया जिससे वे बेहद दुखी हुए। वे ब्रह्माजी के पास गए और अपनी व्यथा व्यक्त की। तब ब्रह्माजी भगवान विष्णु के पास पहुंचे और कहा की प्रभु नए चन्द्रमा की उत्पत्ति पुराने चन्द्रमा को पीड़ा दे रही है, कृपया कोई उपाय बताइये। ब्रह्माजी की विनती सुनकर भगवान विष्णु ने पुराने चन्द्रमा से कहा कि तुम महाकाल वन जाओ और वहां स्थित दिव्य लिंग का पूजन अर्चन करो। वह तुम्हें देह प्रदान करेगा। भगवान विष्णु के कथनानुसार पुराना सोम महाकाल वन पहुंचा और वहां उसने बताये गए लिंग की पूजा अर्चना की। तब भगवान शिव ने प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा। सोम ने कहा कि भगवान ! मुझे कांतिवान, दीप्तिवान तथा देहवान बनाइये। मुझे अपने राज्य सुख की प्राप्ति दीजिये। प्रत्युत्तर में भगवान शिव ने सोम को वरदान प्रदान किया जिसके फलस्वरूप वह देह और राजस्व को प्राप्त हुआ। सोम (चन्द्रमा) ने इनकी स्तुति कर वरदान प्राप्त किया इसलिए इनका नाम सोमेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्द हुआ।

दर्शन लाभ:
मान्यतानुसार श्री सोमेश्वर महादेव के दर्शन करने से खोया वैभव पुनः प्राप्त होता है। ऐसा माना जाता है कि यहाँ दर्शन करने से कुष्ठ रोग दूर होता है।

कहाँ स्थित है?
उज्जयिनी स्थित श्री सोमेश्वर महादेव का मंदिर अनंत पेठ में स्थित है। यहाँ आने के लिए निजी वाहन के अलावा सिटी बस का विकल्प है।

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