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मानव जीवन का उद्देश्य बताने वाले और मोक्ष प्रदान करने वाले श्री विश्वेश्वर महादेव (53/84)

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पौराणिक आधार एवं महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय विदर्भ राज्य में विदूरथ नाम के राजा थे। एक दिन वे शिकार खेलने वन गए और वहां उन्होंने काले मृग की चाल ओढ़े एक ब्राह्मण तपस्वी को मार डाला। इस दोष के फलस्वरूप राजा अंत समय में नर्क को प्राप्त हुआ। नर्क में अनेक यातनाएं भोगने के बाद उसे सर्प योनि प्राप्त हुई। इस योनि में उसने फिर एक ब्राह्मण को काट लिया और लोगों के लाठियों के प्रहार से वह मर गया। वह फिर नर्क को प्राप्त हुआ और वहां यातना भोग कर उसने सिंह की योनि प्राप्त की। सिंह योनि में उसने एक राजा का भक्षण किया जिससे वहां के राजकर्मियों ने उसे मार दिया। फिर वह राजा तीसरी योनि में बाघ बना। बाघ योनि में उसने कई सुवरों और एक वैश्य को मार डाला। फिर वह किसी दूसरे वन चला गया जहाँ किसी शिकारी के बाण से वह मार गया। चौथी योनि में वह हाथी बना और सिंह ने उसे मार डाला। पांचवी योनि में वह खारे पानी में रहने वाला मगर बना जहाँ स्नानादि को आने वाले मनुष्यों को उसने खा लिया और धीवरों ने जाल फैला उसे मार डाला। फिर छठी योनि में वह पिशाच बना जहाँ उसने सिद्ध मन्त्र जाप करने वाले ब्राह्मण का वध कर दिया।

फिर सातवे जन्म में वह मरुभूमि में एक ब्रह्मराक्षस हुआ और उस योनि में राजा निमि से उसकी मृत्यु हुई। आठवें जन्म में वह काला कुत्ता हुआ और उसे सुअरों ने मार डाला। नवीं योनि में वह सियार बना और श्मशान में मांस खाने लगा। एक दिन मांस खाने के लालच में वह आग में जल कर मर गया। दसवें जन्म में वह तीखे मुख वाला भयानक गिद्ध बना और बांसी मांस खाने से रोगग्रस्त हो मर गया। ग्यारहवें जन्म में वह वह अवंतिकापुरी में चांडाल के घर पैदा हुआ। एक दिन वह चोरी करने के लालच में ब्राह्मण के घर में घुसा जहाँ लोगों ने उसे पकड़ कर मारने के लिए एक वृक्ष पर लटका दिया। वहां महादेव का स्थान था जहां वह घबराते हुए दर्शन करता रहा और मृत्यु को प्राप्त हुआ। उस लिंग के दर्शन के फलस्वरूप वह स्वर्ग को प्राप्त हुआ जहाँ से वह पुनः पृथ्वी लोक पर विदर्भ में विश्वेश नाम का राजा हुआ। अंत समय में महादेव के दर्शन के कारण उसे पूर्व जन्म का स्मरण था।

उसने अपना सारा राजपाठ अपने राजकुमार को दे दिया और अपना पूर्व वृत्तांत याद करके अवन्तिकापुर को आया। वहां उसने दिव्य लिंग के दर्शन किये और वहां उसे उस लिंग में महादेव द्वारा प्रदान गए दिव्य नेत्रों से चराचर ब्रह्माण्ड दिखाई देने लगा। लिंग के मध्य उसने सारी सृष्टि, सागर, नदियां, तीनों लोक आदि देखे। तब उसने पूरे भक्तिभाव से उस दिव्य लिंग के समक्ष बैठ आराधना की। तब शिवजी प्रसन्न हुए और राजा से वरदान माँगने को कहा। राजा ने प्रार्थनापूर्वक कहा कि प्रभु जो भी आपके पूजन करे उसे संसार से मुक्ति मिले। साथ ही आपको विश्वेश्वर के नाम से जाना जाये। तत्पश्चात वह राजा शिवगणों के साथ शिवलोक को प्राप्त हुआ।

दर्शन लाभ
मान्यतानुसार श्री विश्वेश्वर महादेव के दर्शन करने से सांसारिक कष्टों से राहत मिलती है। ऐसा माना जाता है कि श्री विश्वेश्वर महादेव के दर्शन करने से मनुष्य का दुर्भाग्य दूर हो लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

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