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सृष्टि का सृजन और लय करने वाले श्री महालयेश्वर महादेव (२४/८४)

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महालयम महाभागे चतुर्विशतिकम शुभम।
ब्रह्मा दिस्तमनपर्यतम त्रैलोक्यं स चराचरम। ।

परिचय:
श्री महालयेश्वर महादेव की कथा सृष्टि की नश्वर प्रकृति तथा मानव जीवन में प्रभु आराधना का महत्व दर्शाती है।

पौराणिक आधार एवं महत्व:
पौराणिक कथाओं के आधार पर एक बार भगवान देवाधिदेव महादेव माँ पार्वती से कहते हैं कि इस सारी सृष्टि में जो भी चर अचर, स्थावर जंगम, कीट पतंग, ब्रह्मा, विष्णु आदि मेरे द्वारा ही उत्पन्न होकर मुझमे ही लीन हो जाते हैं। वे आगे कहते हैं कि महाकाल वन में मुक्तेश्वर महादेव के दक्षिण में स्थित महालयेश्वर लिंग में वे सूक्ष्मरूप में विराजित हैं। उसी लिंग में ब्रह्मा तथा विष्णु का भी वास है। उसी लिंग में आत्मा का वास हुआ है तथा अहंकार, धृति, ख्याति, स्मृति, लज्जा, सरस्वती, आदि श्रुतियां सभी इसी लिंग में वास करती हैं। तप, कर्म, पुण्य, व्रत, दान के साथ रज, सत्व और ताम आदि गुण भी इसी लिंग से उत्पन्न होते हैं। इसी लिंग से आत्मा का भी सृजन हुआ है। आगे भगवान शिव कहते हैं कि उपर्युक्त सारी संरचनाएं मेरे ही द्वारा इस लिंग से उत्पन्न होती हैं और प्रलय के समय इसी लिंग में लीन हो जाती है। इसलिए इस लिंग को महालयेश्वर कहा जाता है।

प्रलय काल में जब सृष्टि का संहार होता है, विनाश व विप्लावन की स्थिति बनती है तब सारा जगत, ब्रह्मा, विष्णु, चर, अचर समस्त प्राणी इसी लिंग में लय हो जाते हैं और जब इसके पश्चात नवीन सृष्टि का निर्माण होता है तब वे सभी जीव चर-अचर इसी लिंग से प्रकट होते हैं तथा इससे ही उत्पन्न होकर प्रजापति पुनः इस सृष्टि की रचना करते हैं।

दर्शन लाभ:
मान्यतानुसार श्री महालयेश्वर महादेव की स्तुति करने से मनुष्य त्रैलोक्यविजयी होता है और कीर्ति प्राप्त करता है। श्रावण मास में यहाँ दर्शन का विशेष महत्व माना गया है।

कहाँ स्थित है?
उज्जयिनी स्थित चौरासी महादेव में से एक श्री महालयेश्वर महादेव का मंदिर खत्रीवाड़ा में स्थित मुक्तेश्वर महादेव के दक्षिण में स्थित है। यहाँ आने के लिए निजी वाहनों के अलावा सिटी बस का भी विकल्प है।

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