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चौरासी महादेव में अड़तीसवें श्री कुसुमेश्वर महादेव (38/84)

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ये त्वां द्रक्ष्यन्ति गणप! कुसुमेश्वर संज्ञकम्।
न तेषां जायते पापं पद्मपत्रेयथाजलम।।

पौराणिक कथा एवं महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर पार्वती माँ से बोले कि मुझे एक बालक अत्यंत प्रिय है। वह वीरकगण पुष्पों से सुसज्जित है। कई प्रकार के गणों को जानने वाला और कई गुणों का स्वामी यह बालक मुझे अति प्रिय है। तब माँ पार्वती बोली कि वे भी उस दिव्य बालक को देखना चाहती हैं। माँ पार्वती के कहने पर शिवजी बोले कि यह बालक में तुम्हें पुत्र रूप में देता हूँ। यह सुन माता पार्वती बेहद प्रसन्न हुईं एवं अपनी सखी विजया से बोली कि भगवान शिव ने यह बालक मुझे पुत्र रूप में दिया है, इसे मेरे पास ले आओ। तब विजया उस बालक के पास पहुँच उससे बोली कि तुम यहां गणों के साथ खेल रहे हो और वहाँ महादेव तुम पर क्रोधित हो रहे हैं। विजया की बात सुन वह बालक भयभीत होता हुआ माँ पार्वती के पास पहुँचा।

पुष्पों से विभूषित और भय से व्याप्त बालक को देख कर माता पार्वती ने कहा कि तुम्हें पुत्र के रूप में मुझे महादेव ने दिया है। ऐसा कह कर माता ने उसे अपनी गोद में बैठा लिया। फिर माता पार्वती ने उसे वस्त्र धारण कराये एवं उसे दिव्य आभूषणों से सुसज्जित किया। फिर उसके मस्तक पर चन्दन लगा कर उससे गणों के मध्य जाकर खेलने को कहा। फिर वह बालक वहां से गणों के मध्य गया और संध्या समय तक खेलता रहा। फिर माता पार्वती भगवान शंकर से बोली कि प्रभु इस बालक को गणों का स्वामी बना कर कोई अक्षय स्थान प्रदान कीजिये। तब भगवान ने उसे महाकाल वन में शिवेश्वर के उत्तर में स्थान दिया। कुसुमों से सुसज्जित होने के कारण इनका नाम कुसुमेश्वर कहलाया।

दर्शन लाभ
मान्यतानुसार श्री कुसुमेश्वर महादेव के दर्शन से शिवलोक की प्राप्ति होती है। श्रवण मास में यहाँ दर्शन का विशेष महत्व होता है।

कहाँ स्थित है?
उज्जयिनी स्थित चौरासी महादेव में से एक श्री कुसुमेश्वर महादेव का मंदिर अंकपात क्षेत्र में राम-जनार्दन मंदिर के ऊपर स्थित है।

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