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ऐश्वर्य और आरोग्य प्रदान करने वाले श्री कामेश्वर (मनकामनेश्वर) महादेव (१३/८४)

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विद्धि कामेश्वरम् देवी तत्र लिङ्ग त्रयोदशम।
यस्य दर्शन मात्रेण सौभाग्यं जायते शुभम। ।

परिचय:
श्री कामेश्वर महादेव की स्थापना की कथा ब्रह्माजी की प्रजा वृद्धि के चलते कामदेव की उत्पत्ति और फिर ब्रह्माजी द्वारा उसे प्रदान किये गए १२ स्थानों को वर्णित करती है। प्रस्तुत पौराणिक उल्लेख में शिवजी की शक्ति के साथ उनकी करुणा का भी महिमामंडन किया गया है कि कैसे कामदेव ने शिवजी पर बाण छोड़ा था फिर भी उन्होंने करुणामय होते हुए कामदेव को देहरहित सामर्थ्य होने और कृष्णावतार के समय में जन्म लेने का वरदान दिया।

पौराणिक आधार एवं महत्व:
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय ब्रह्माजी प्रजा वृद्धि की कामना से ध्यान मग्न थे। उसी समय उनके अंश से तेजस्वी पुत्र काम उत्पन्न हुए और कहने लगे कि मेरे लिए क्या आज्ञा है? तब ब्रह्माजी बोले कि मैंने सृष्टि उत्पन्न करने के लिए प्रजापतियों को उत्पन्न किया था किन्तु वे सृष्टि रचना में समर्थ नहीं हुए, इसलिए में तुम्हें इस कार्य की आज्ञा देता हूँ। यह सुन कामदेव वहां से विदा होकर अदृश्य हो गए । यह देख ब्रह्माजी क्रोधित हुए और शाप दे दिया कि तुमने मेरा वचन नहीं माना इसलिए तुम्हारा जल्दी ही नाश हो जाएगा। शाप सुनकर कामदेव भयभीत हो गए और हाथ जोड़कर ब्रह्मा के समक्ष क्षमा मांगने लगे । कामदेव के अनुनय विनय से ब्रह्माजी प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा में तुम्हें रहने के लिए १२ स्थान देता हूँ – स्त्रियों के कटाक्ष, केशराशि, जंघा, वक्ष, नाभि, जंघमूल, अधर, कोयल की कूक, चांदनी, वर्षाकाल, चैत्र और वैशाख महीना । इस प्रकार कह कर ब्रह्माजी ने कामदेव को पुष्प का धनुष और पांच बाण देकर विदा कर दिया।

ब्रह्माजी से मिले वरदान की सहायता से कामदेव तीनों लोकों में भ्रमण करने लगे और भूत, पिशाच, गन्धर्व, यक्ष, सभी को काम ने अपने वशीभूत कर लिया। फिर मछली का ध्वज लगा कर कामदेव अपनी पत्नी रति के साथ संसार के सभी प्राणियों को अपने वशीभूत करने बढ़े । इसी क्रम में वह शिवजी के पास पहुंचे । भगवान शिव तब तपस्या में लीन थे तभी कामदेव छोटे से जंतु का सूक्ष्म रूप लेकर कर्ण के छिद्र से भगवान शिव के शरीर में प्रवेश कर गए । इससे शिवजी का मन चंचल हो गया। उन्होंने विचार धारण कर चित्त में देखा कि कामदेव उनके शरीर में स्थित है। इतने में ही इच्छा शरीर धारण करने वाले कामदेव भगवान शिव के शरीर से बाहर आ गए और आम के एक वृक्ष के नीचे जाकर खड़े हो गए । फिर उन्होंने शिवजी पर मोहन नामक बाण छोड़ा जो शिवजी के ह्रदय पर जाकर लगा। इससे क्रोधित हो शिवजी ने अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से उन्हें भस्म कर दिया।

कामदेव को जलता देख उनकी पत्नी रति विलाप करने लगी। तभी आकाशवाणी हुई जिसमें रति को रुदन न करने और भगवान शिव की आराधना करने को कहा गया। फिर रति ने श्रद्धापूर्वक भगवान शंकर की प्रार्थना की। रति की प्रार्थना से प्रसन्न हो शिवजी ने कहा कि कामदेव ने मेरे मन को विचलित किया था इसलिए मैंने इन्हें भस्म कर दिया। अब अगर यह अनंग रूप में महाकाल वन में जाकर शिवलिंग की आराधना करेंगे तो इनका उद्धार होगा। तब कामदेव महाकाल वन आए और उन्होंने पूर्ण भक्ति भाव से शिव लिंग की उपासना की। उपासना के फलस्वरूप शिवजी ने प्रसन्न होकर कहा कि तुम अनंग, शरीर के बिन रह कर भी समर्थ रहोगे। कृष्णावतार के समय तुम रुक्मणी के गर्भ से जन्म लोगे और तुम्हारा नाम प्रद्युन्न होगा।

दर्शन लाभ:
मान्यतानुसार कामदेव द्वारा पूजित कामेश्वर महादेव के पूजन अर्चन से ऐश्वर्य, आरोग्य, संतान सुख , भोग आदि की प्राप्ति होती है। यहाँ चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन दर्शन का विशेष महत्व माना गया है।

कहाँ स्थित है?
उज्जयिनी स्थित श्री कामेश्वर महादेव का मंदिर गंधर्ववती घाट पर स्थित है।

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