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पापों को नष्ट कर स्वर्ग प्रदान करने वाले श्री अनर्केश्वर महादेव (२७/८४)

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सप्तविंशतिमं देवयंअर्केश्वर संज्ञकम्।
यस्य दर्शन मात्रेण स्वप्नोपि नरकः कुतः।।

परिचय:
श्री अनर्केश्वर महादेव की स्थापना की कथा सत्कर्म एवं आचरण की महत्ता दर्शाती है। कर्म का कैसा भी स्वाभाव हो, हर स्थिति में उसका फल मिलता ही है। प्रस्तुत पौराणिक कथा सद्कर्मों में ही निहित रहने की प्रेरणा देती है।

पौराणिक आधार एवं महत्व:
पौराणिक कथाओं के आधार पर प्राचीन काल में वराह कल्प में जनता मर्यादाविहीन हो गई। चारोँ और व्यभिचार व्याप्त हो गया, मनुष्य नास्तिक हो गए, वर्णाश्रम नष्ट हो गए, देवताओं, ब्राह्मणों के पूजन बंद हो गए, वेदपाठ यज्ञादि भी बंद हो गए। फलस्वरूप मनुष्य का पतन हो नर्क में गमन होने लगा। ऐसी स्थिति में राजा निमी यमराज के दूत के साथ यमलोक जा रहे थे। तभी उन्हें यमराज के एक दूत ने नर्क दिखाया। राजा ने नर्क में अनेक लोगों को यातनाएं भुगतते हुए, अत्यंत पीड़ादायक स्थिति में देखा। तब राजा ने दूत से पूछा कि उन्होंने ऐसा कौन सा पाप किया था जो उन्हें यह मार्ग दिखाया गया। प्रत्युत्तर में दूत ने कहा कि राजन, श्राद्ध में जो दक्षिणा देने का आपका वचन था वो आपने पूरा नहीं किया। प्रमाद में आप यह कार्य करना भूल ही गए। यह आपका एक पाप था जिसका फल आपने नरक देख भोग लिया। अब आपके पुण्य कर्मों के लिए आप स्वर्ग पधारेंगे।

जब राजा और दूत आगे जाने लगे तो पाप भोगने वाला एक पापी राजा के निकट आया और कहने लगा कि राजन आपके यहाँ रहने से हमें बहुत सुख मिल रहा है। हमारी पीड़ा कम हो रही है। कृपया आप कुछ देर और यहाँ रुकें। तब राजा ने दूत से पूछा कि उन्होंने ऐसा कौन सा कर्म किया था जिससे पाप भुगत रहे इन लोगों को सुख की प्राप्ति हो रही है। दूत ने कहा कि राजन आपने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाकाल वन स्थित दिव्य अनर्केश्वर के दर्शन किये थे। यह उसी का फल है। आपके शरीर से स्पर्श होने वाली वायु इन्हें सुख दे रही है। तब राजा बोले कि अगर मेरे यहाँ रहने से इन्हें सुख की प्राप्ति हो रही है तो कृपया मुझे यहाँ ही रहने दें। मैं आपके साथ नहीं जाना चाहता। दूत ने कहा राजन यह आपका स्थान नहीं है, आप मेरे साथ स्वर्गलोक चलिए। राजा ने कहा कि मुझे स्वर्गलोक में भी वो सुख नही मिलेगा जो मुझे यहाँ इन पाप भोगियों की मदद करके मिलेगा, अतः कृपया मुझे यहीं रहने दीजिये। तब भगवान इंद्र और धर्मराज स्वयं वहां आये और राजा से साथ चलने को कहा। राजा के मना करने पर वे बोले कि ये सभी अपने ही कर्मों की सजा भोग रहे हैं। इन्हे अपने किये का फल भोगने दीजिये और आप अपने किये का फल भोगने हमारे साथ स्वर्ग चलिए। तब राजा बोले कि प्रभु मैं इन्हें ऐसे छोड़ कर नहीं जा सकता। कृपया आप कोई उपाय बताएं जिससे ये पाप मुक्त हो जाएं। इंद्र ने राजा से कहा कि आपके पास अनर्केश्वर के दर्शन करने का बड़ा पुण्य है। आप अपने पुण्य का एक भाग अगर इन लोगों को दे दें तो ये भी पाप मुक्त हो जाएंगे। इंद्र की बात सुनकर राजा ने अपने पुण्य का एक भाग उन लोगों को दान में दिया जिससे राजा सहित वे सभी नरक भोगी भी स्वर्ग को प्राप्त हुए।

दर्शन लाभ:
मान्यतानुसार यहाँ दर्शन करने वाले लोगों के सभी पाप नष्ट हो उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है। यहाँ दर्शन साल भर में कभी भी किया जा सकते हैं लेकिन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन दर्शन का विशेष महत्व माना गया है।

कहाँ स्थित है?
उज्जयिनी स्थित चौरासी महादेव में से एक श्री अनर्केश्वर महादेव का मंदिर इंदिरा नगर में स्थित है।

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