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देश-विदेश के श्रद्धालुओं द्वारा पूजा जाने वाला सिद्ध वट वृक्ष सिद्धवट

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परिचय:
शिप्रा नदी के तट पर स्थित विश्व प्रसिद्ध सिद्धवट उज्जैन की धार्मिक विविधता को प्रमाणित करता है। यह प्रसिद्ध स्थान एक दिव्य चमत्कारिक वट वृक्ष है। जिस प्रकार प्रयाग (इलाहबाद) में अक्षयवट, गया (बिहार) में बौद्धवट तथा मथुरा वृन्दावन में बंशीवट है, उज्जैन में सिद्धवट है। ऐतिहासिक वर्णन के अनुसार इस अति प्राचीन वट वृक्ष को मुग़ल काल में कटवा कर सात लोहे के तवों से जड़वा दिया गया था लेकिन यह दिव्य वृक्ष उन लोहे के तत्वों को फोड़ फिर से हरा भरा हो गया।

पौराणिक आधार एवं महत्व:
पौराणिक मान्यताओं में स्कन्द पुराण के अवन्ति खंड उल्लेखानुसार इस वट वृक्ष का रोपण स्वयं माता पार्वती ने अपने हाथों से किया था। माँ पार्वती ने अपने पुत्र कार्तिकेय को यहाँ पूजन भी करवाया था। पौराणिक उल्लेख के अनुसार देवों और असुरों की लड़ाई के पूर्व इसी स्थान पर देवताओं ने शिवपुत्र कार्तिकेय को सेनापति पद पर अभिषेक किया था। इसी के बाद कार्तिक स्वामी ने तारकासुर राक्षस का वध किया था। वध के पश्चात वह शक्ति जिस शक्ति से कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया था, वह शक्ति क्षिप्रा नदी के इसी घाट में समाहित हो गई थी इसलिए इस तीर्थ का नाम शक्तिभेद तीर्थ कहलाया। यहाँ हर मनोकामना पूर्ण होती है एवं संकल्पित कार्य सिद्ध होते हैं इसलिए इसे सिद्ध वट कहा जाता है। इसका एक नाम भद्रजटा तीर्थ है क्योंकि स्वामी कार्तिकेय की जटा यहाँ कटी थी। इसलिए यहाँ बच्चों का मुंडन संस्कार भी होता है। मानयतानुसार यहाँ कई तीर्थों का वास है इसलिए इसे कोटितीर्थ भी कहा जाता है।
यह वटवृक्ष कल्पवृक्ष है। संपत्ति अर्थात भौतिक व लौकिक सुख-सुविधाओं की कामना हेतु वट वृक्ष पर रक्षा सूत्र बाँधा जाता है। उज्जैन में लगने वाला कार्तिक मेला इसी तीर्थ से जाना जाता है।

इतिहास एवं संरचना:
अतिप्राचीन सिद्धवट का वर्णन लगभग ५५०० साल पुराने स्कन्द पुराण में मिलता है, उसी से इस मंदिर की अतिप्रचीनता का पता चलता है। ऐतिहासिक वर्णनानुसार सम्राट विक्रमादित्य ने इसी वट वृक्ष के नीचे घोर तपस्या कर बेताल को वश में करने की सिद्धि प्राप्त की थी। साथ ही भारत सम्राट अशोक के पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा ने श्रीलंका आदि सुदूर देशों में धर्म प्रचार की यात्राएं की थी जिसके पहले उन्होंने इसी वट वृक्ष का पूजन अर्चन किया था।

यहाँ मुख्य रूप से वट का ही पूजन किया जाता है। वट की शाखा पर शिव स्वरुप में अत्यंत मनोरम श्रंगार किया जाता है। नित्य प्रतिदिन कंकु और चन्दन से भगवान का पार्थिव पूजन होता है। यहाँ सिद्धवट के सामने चौरासी महादेव में से एक श्री वडलेश्वर महादेव का मंदिर में भी है जिसका दर्शन लाभ सिद्धवट के दर्शन करने वाले सभी श्रद्धालु लेते हैं। यह वट वृक्ष क्षिप्रा नदी के किनारे स्थित है और इसी के नाम से यहाँ स्थित घाट को सिद्धवट घाट कहा जाता है। इस घाट पर कई धार्मिक संस्कार संपन्न किये जाते हैं।

दर्शन लाभ एवं प्रथाएं:
पितृ शान्ति, संतान कामना एवं धन कामना की पूर्ती हेतु यहाँ दूर दूर से लोग आते हैं। यहाँ दूध चढ़ाने का विशेष महत्व माना जाता है। माना जाता है कि यहाँ दूध चढ़ाने से पितरों को शांति मिलती है। यहाँ पिंड दान, एवं कालसर्पदोष निवारण भी होता है। जो लोग निसंतान होते हैं वे यहाँ आकर संतान प्राप्ति के लिए पूजा अर्चना उल्टा स्वस्तिक बनाते हैं जिससे उन्हें मनवांछित संतान की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही अपने लक्ष्य में रूकावट, बाधा न आये इस कामना के साथ श्रद्धालु यहाँ रक्षा सूत्र बांधते हैं।

कैसे पहुंचे?
उज्जैन स्थित सिद्धवट भेरूगढ़ मार्ग पर स्थित है। यहाँ आने के लिए सिटी बस, टैक्सी सेवाएं भी उपलब्ध है। उज्जैन दर्शन बस द्वारा भी यहाँ कई श्रद्धालु आते हैं। अधिकांश यात्री अपने निजी वाहनों से यहाँ दर्शन लाभ लेने आते हैं।

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