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उज्जयिनी स्थित चौरासी महादेव में से एक श्री ओंकारेश्वर महादेव (52/84)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में भगवान शंकर ने अपने मुख से पीली आकृति वाले एक दिव्य पुरुष को उत्पन्न किया। उस पुरुष ने शिवजी से कहा कि प्रभु मेरे लिए क्या आज्ञा है? प्रत्युत्तर में शिवजी बोले कि तुम अपनी आत्मा का विभाजन करो। ऐसा कह कर शिवजी अंतर्ध्यान हो गए।

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मुक्ति प्रदान करने वाले श्री शूलेश्वर महादेव (51/84)

पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन काल में राज्य प्राप्ति के लिए देवताओं और दानवों में भयंकर संग्राम हुआ। तब देवताओं के मुखिया इंद्र थे और दानवों के प्रमुख जंभ थे। युद्ध में देवता हार गए और दानव विजयी हुए। तब असुरों में श्रेष्ठ बलशाली अंधकासुर स्वर्ग पर राज करने लगा।

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मानव जीवन का उद्देश्य बताने वाले और मोक्ष प्रदान करने वाले श्री विश्वेश्वर महादेव (53/84)

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय विदर्भ राज्य में विदूरथ नाम के राजा थे। एक दिन वे शिकार खेलने वन गए और वहां उन्होंने काले मृग की चाल ओढ़े एक ब्राह्मण तपस्वी को मार डाला। इस दोष के फलस्वरूप राजा अंत समय में नर्क को प्राप्त हुआ। नर्क में अनेक यातनाएं भोगने के बाद उसे सर्प योनि प्राप्त हुई।

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सुख समृद्धि प्रदान करने वाले श्री शिवेश्वर महादेव (37/84)

श्री शिवेश्वर महादेव की स्थापना की कथा शिव माहात्म्य का वर्णन करती है। नित प्रतिदिन शिव आराधना करके राजा रिपुंजय की रानी बहुला देवी को सुख समृद्धि की प्राप्ति हुई थी।

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वृष्टि करने वाले श्री उत्तरेश्वर महादेव (44/84)

श्री उत्तरेश्वर महादेव की स्थापना की कथा वृष्टि एवं सृष्टि संचालन में शिव महत्ता दर्शाती है। मान्यतानुसार श्री उत्तरेश्वर महादेव की कृपा से ही वृष्टि संभव हुई थी।

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बुद्धि को सौम्यता प्रदान करने वाले श्री अक्रूरेश्वर महादेव ( 39/84)

प्रस्तुत कहानी शिव पार्वती की एकरूपता को वर्णित करती है। प्रस्तुत कहानी में क्रूर बुद्धि के दोषों को दर्शाया गया है और सौम्य बुद्धि की महत्ता दर्शाई गई है।

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रोग दूर कर दीर्घायु प्रदान करने वाले श्री कंथडेश्वर महादेव (34/84)

पौराणिक कथाओं के आधार पर वितस्ता नाम की नदी पर एक ब्राह्मण रहा करता था जिसका नाम पांडव था। वह दरिद्रता से पीड़ित था एवं उसकी पत्नी तथा सगे सम्बन्धियों ने भी उसका साथ छोड़ दिया था। उस ब्राह्मण ने पुत्र की कामना से गुफा में बैठ कर भगवान शिव की आराधना की।

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प्रतिष्ठा प्रदान करने वाले श्री कुंडेश्वर महादेव (40/84)

श्री कुंडेश्वर महादेव की कथा शिव तपस्या का माहात्म्य दर्शाती है। शिव की तपस्या से ही शिवगण कुंड को शाप से मुक्ति मिली एवं पुनः गणों के स्वामी का पद प्राप्त हुआ।

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रोगों से मुक्त करने वाले श्री लुम्पेश्वर महादेव (41/84)

श्री लुम्पेश्वर महादेव की पौराणिक कथा शिव उपासना का माहात्म्य दर्शाती है। राजा लुम्प का कुष्ठ रोग महाकाल वन में स्थित दिव्य लिंग के पूजन से ही दूर हुआ।

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चौरासी महादेव में अड़तीसवें श्री कुसुमेश्वर महादेव (38/84)

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर पार्वती माँ से बोले कि मुझे एक बालक अत्यंत प्रिय है। वह वीरकगण पुष्पों से सुसज्जित है। कई प्रकार के गणों को जानने वाला और कई गुणों का स्वामी यह बालक मुझे अति प्रिय है। तब माँ पार्वती बोली कि वे भी उस दिव्य बालक को देखना चाहती हैं। माँ पार्वती के कहने पर शिवजी बोले कि यह बालक में तुम्हें पुत्र रूप में देता हूँ।

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पुत्र प्रदान करने वाले श्री मार्कण्डेयेश्वर महादेव (36/84)

पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन काल में मृकण्ड नाम के महर्षि थे। वे वेदों में पारंगत थे परन्तु उनको कोई पुत्र नहीं था। पुत्र प्राप्ति के लिए उन्होंने हिमालय पर्वत पर जाकर तपस्या करने का निश्चय किया। पहले वर्ष उन्होंने वायु ग्रहण करके तप किया, दूसरे वर्ष उन्होंने जल भक्षण करके तप किया। तीसरे वर्ष निराहार उन्होंने प्रभु के नाम का जप किया, फिर और भी कठिन तप करने लगे।

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दोषों को दूर कर विजयश्री प्रदान करने वाले श्री इंद्रेश्वर महादेव (35/84)

श्री इंद्रेश्वर महादेव की कथा बुराई पर अच्छाई की जीत का महिमामंडन करती है। प्रस्तुत पौराणिक कथा के अनुसार यह शिवलिंग स्वयं इंद्र द्वारा पूजा गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन काल में त्वष्ट नाम के प्रजापति थे। उनका एक पुत्र था जिसका नाम कुशध्वज था। एक बार देवराज इंद्र से कुशध्वज का झगड़ा हो गया जिसके फलस्वरूप इंद्र ने कुशध्वज का वध कर दिया।

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ऐश्वर्य और आरोग्य प्रदान करने वाले श्री कामेश्वर (मनकामनेश्वर) महादेव (१३/८४)

श्री कामेश्वर महादेव की स्थापना की कथा ब्रह्माजी की प्रजा वृद्धि के चलते कामदेव की उत्पत्ति और फिर ब्रह्माजी द्वारा उसे प्रदान किये गए १२ स्थानों को वर्णित करती है। प्रस्तुत पौराणिक उल्लेख में शिवजी की शक्ति के साथ उनकी करुणा का भी महिमामंडन किया गया है कि कैसे कामदेव ने शिवजी पर बाण छोड़ा था फिर भी उन्होंने करुणामय होते हुए कामदेव को देहरहित सामर्थ्य होने और कृष्णावतार के समय में जन्म लेने का वरदान दिया।

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कलह दूर कर गृह शांति प्रदान करने वाले श्री कलकलेश्वर महादेव (१८/८४)

मान्यतानुसार श्री कलकलेश्वर महादेव के दर्शन, पूजन, अभिषेक करने से पति-पत्नी का कलह व मनमुटाव समाप्त होता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार माँ पार्वती मंडप में मातृकाओं के साथ बैठी थी। उनके मध्य वह कृष्ण वर्ण की दिख रही थी। तब भगवान शंकर ने कहा - हे महाकाली ! तुम मेरे पास आकर बैठो।

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सृष्टि का सृजन और लय करने वाले श्री महालयेश्वर महादेव (२४/८४)

श्री महालयेश्वर महादेव की कथा सृष्टि की नश्वर प्रकृति तथा मानव जीवन में प्रभु आराधना का महत्व दर्शाती है। पौराणिक कथाओं के आधार पर एक बार भगवान देवाधिदेव महादेव माँ पार्वती से कहते हैं कि इस सारी सृष्टि में जो भी चर अचर, स्थावर जंगम, कीट पतंग, ब्रह्मा, विष्णु आदि मेरे द्वारा ही उत्पन्न होकर मुझमे ही लीन हो जाते हैं।

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खोया वैभव पुनः प्रदान करने वाले श्री सोमेश्वर महादेव (२६/८४)

श्री सोमेश्वर महादेव की स्थापना की कथा प्रभु भक्ति की महत्ता दर्शाती है। स्वयं चन्द्र को भी अन्तर्धान हो जाना पड़ा एवं उन्हें भी प्रभु वंदना से ही पुनः देह एवं राज्य प्राप्त हुआ।

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पापों को नष्ट कर स्वर्ग प्रदान करने वाले श्री अनर्केश्वर महादेव (२७/८४)

श्री अनर्केश्वर महादेव की स्थापना की कथा सत्कर्म एवं आचरण की महत्ता दर्शाती है। कर्म का कैसा भी स्वाभाव हो, हर स्थिति में उसका फल मिलता ही है। प्रस्तुत पौराणिक कथा सद्कर्मों में ही निहित रहने की प्रेरणा देती है।

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मोह माया से आसक्ति दूर कर मोक्ष प्रदान करने वाले श्री आनंदेश्वर महादेव

पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन काल में अनमित्र नाम के राजा थे। वे धर्मात्मा, पराक्रमी एवं सूर्य के समान तेजस्वी थे। उनकी रानी का नाम गिरिभद्रा था जो कि अति सुन्दर एवं राजा की प्रिय थी। राजा को आनंद नाम का एक पुत्र हुआ। पैदा होते ही वह अपनी माता की गोद में हंसने लगा।

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विजयश्री प्रदान कर नाशों का हरण करने वाले श्री ईशानेश्वर महादेव (१६/८४)

श्री ईशानेश्वर महादेव की स्थापना की कहानी बुराई पर अच्छाई की जीत का माहात्म्य दर्शाती है कि किस प्रकार दानवों के शक्तिशाली आधिपत्य के बाद भी शिव शक्ति द्वारा उनका संहार किया गया।

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अभय दान देने वाले श्री च्यवनेश्वर महादेव (३०/८४)

पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन कल में महर्षि भृगु के पुत्र च्यवन थे जिन्होंने पृथ्वी पर कठोर तप किया। वितस्ता नाम की नदी के किनारे वर्षों वे तपस्या में बैठे रहे। तपस्या में लीन रहने के कारण उनके पुरे शरीर को धूल मिट्टी ने ढक लिया और आस पास बैल लग गई।

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दोषों को दूर कर विजयश्री प्रदान करने वाले श्री रामेश्वर महादेव (२९/८४)

श्री रामेश्वर महादेव की कथा महाकाल वन का महात्मय दर्शाती है। परशुरामजी ने कई तीर्थों के दर्शन एवं तप किये लेकिन उनका ब्रम्ह हत्या दोष निवारण महाकाल वन में स्थित श्री रामेश्वर महादेव के पूजन से ही हुआ।

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मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाले श्री मुक्तेश्वर महादेव (२५/८४)

श्री मुक्तेश्वर महादेव की महिमा मुक्ति के मार्ग की ओर इंगित करती है। स्वयं तेजस्वी जितेन्द्रिय ब्राह्मण भी तेरह वर्षों की तपस्या के बाद महाकाल वन में आकर मोक्ष का मार्ग पा सके।

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कीर्ति एवं स्वर्ग प्रदान करने वाले श्री इन्द्रद्युम्नेश्वर महादेव (१५/८४)

श्री इन्द्रद्युम्नेश्वर महादेव की स्थापना की कथा शुभ एवं निष्काम कर्म करने एवं पुण्यार्जन की महत्व बताती है। प्रस्तुत कहानी यह दर्शाती है कि पृथ्वी पर शुभ कर्म करने से ही कीर्ति एवं स्वर्ग संभव है।

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सिद्धि प्रदान करने वाले श्री खंडेश्वर महादेव (३१/८४)

श्री खंडेश्वर महादेव का मंदिर शिव माहात्म्य के मूल्यों को दर्शाता है। माना जाता है कि श्री खंडेश्वर महादेव के दर्शन से विष्णु, ब्रह्मा, इंद्र, कुबेर, अग्नि आदि देवताओं ने भी सिद्धि प्राप्त की थी।

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महाकाल वन की महिमा बताने वाले श्री पत्तनेश्वर महादेव (३२/८४)

श्री पत्त्नेश्वर महादेव की महिमा का गान स्वयं भगवान शिव एवं महर्षि नारद द्वारा किया गया है जो स्कन्द पुराण में वर्णित है।

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दोषों को दूर कर निर्मल बुद्धि प्रदान करने वाले श्री जटेश्वर महादेव (२८/८४)

श्री जटेश्वर महादेव की कथा राजा वीरधन्वा और उनके द्वारा वन में किये गए दोषों के निवारण से जुडी हुई है। प्रस्तुत कथा ऋषि-मुनियों की महत्ता दर्शाती है। मुनि द्वारा बताये गए मार्ग पर ही राजा को शांति प्राप्त हो सकी।

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पापों का हरण कर आरोग्य देने वाले श्री नागचण्डेश्वर महादेव (१९/८४)

श्री नागचण्डेश्वर की स्थापना की कथा अनजाने में हुए कई दोषों को चित्रित करती है। इनके दर्शन से देवताओं के भी शिव निर्माल्य (शिव लिंगों का समूह) दोष का निवारण हुआ था।

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दोषों को दूर कर मोक्ष प्रदान करने वाले श्री कर्कटेश्वर महादेव (२२/८४)

श्री कर्कटेश्वर महादेव की स्थापना की कहानी राजा धर्ममूर्ति और पिछले जन्म में उनकी केकड़ा योनि से स्वर्ग प्राप्ति की महिमा से जुडी हुई है। प्रस्तुत कथा में सुकर्म एवं शिवालय का माहात्म्य दर्शाया गया है।

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वर्षा कर सुखा दूर करने वाले श्री मेघनादेश्वर महादेव (२३/८४)

श्री मेघनादेश्वर महादेव की स्थापना की कथा पुण्य कर्मों की महत्ता और दोषों के दुष्परिणाम की ओर इंगित करती है। राजा के दोषों एवं दुष्कर्मों के कारण ही वर्षा व्याधित हुई।

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दोषों को दूर कर पुनः स्थान प्रदान करने वाले श्री अप्सरेश्वर महादेव (१७/८४)

श्री अप्सरेश्वर महादेव की कथा महाकाल वन की महत्ता और अप्सराओं की शिव आराधना को चित्रित करती है। अप्सराओं द्वारा पूजे गए इस लिंग से अप्सरा रम्भा का शाप दोष दूर हुआ था।

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चौरासी महादेव में छठे स्थान पर आने वाले श्री स्वर्णजालेश्वर महादेव (६/८४)

एक समय भगवान शिव और माता पार्वती को सांसारिक धर्म में सलंग्न रहते सौ वर्ष हो गए लेकिन तारकासुर वध हेतु उन्हें कोई पुत्र उत्पन्न नही हुआ। तब देवताओं ने अग्नि देव को शिवजी के पास भेजा। शिवजी ने त्रैलोक्य हित के लिए अपना अंश अग्नि देव के मुख में स्थान्तरित कर दिया।

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स्वर्ग प्रदान करने वाले श्री लोकपालेश्वर महादेव (१२/८४)

श्री लोकपालेश्वर महादेव की कथा देवताओं पर दैत्यों के बढ़ते प्रभुत्व और फिर उनकी शिव आराधना द्वारा दैत्यों के संहार से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप द्वारा अनेक दैत्यगण पैदा हुए थे। उन्होंने वन पर्वतों में जा आश्रम नष्ट कर सम्पूर्ण पृथ्वी को उथल पुथल कर दिया। यज्ञ नष्ट हो गए।

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कुटुंब की वृद्धि करने वाले श्री कुटुम्बेश्वर महादेव (१४/८४)

श्री कुटुम्बेश्वर महादेव की स्थापना की कथा महादेव के करुणामय मन एवं क्षिप्रा मैया की कर्तव्यपरायणता दर्शाती है। करुणामय भगवान शिव ने सृष्टि को विष के भयानक दुष्प्रभाव से बचाने के लिए स्वयं उस विष को धारण कर लिया।

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चौरासी महादेव में ग्यारवे स्थान पर आने वाले श्री सिद्धेश्वर महादेव (११/८४)

श्री सिद्धेश्वर महादेव की स्थापना की कथा ब्राह्मणों द्वारा स्वार्थवश सिद्धि प्राप्त करने की दशा में नास्तिकता की ओर बढ़ने और फिर उनकी महादेव आराधना से जुडी हुई है।

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देश-विदेश के श्रद्धालुओं द्वारा पूजा जाने वाला सिद्ध वट वृक्ष सिद्धवट

शिप्रा नदी के तट पर स्थित विश्व प्रसिद्ध सिद्धवट उज्जैन की धार्मिक विविधता को प्रमाणित करता है। यह प्रसिद्ध स्थान एक दिव्य चमत्कारिक वट वृक्ष है। जिस प्रकार प्रयाग (इलाहबाद) में अक्षयवट, गया (बिहार) में बौद्धवट तथा मथुरा वृन्दावन में बंशीवट है, उज्जैन में सिद्धवट है।

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धर्म आचरण की महत्ता दर्शाने वाले श्री कर्कोटकेश्वर महादेव (१०/८४)

श्री कर्कोटकेश्वर महादेव की स्थापना की कथा कर्कोटक नामक सर्प और उसकी शिव आराधना से जुड़ी हुई है। श्री कर्कोटकेश्वर महादेव की कथा में धर्म आचरण की महत्ता दर्शाई गई है।

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ग्रहों के सेनापति मंगल की जन्मस्थली, श्री मंगलनाथ मंदिर उज्जैन

उज्जयिनी स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री मंगलेश्वर मंगलनाथ के बारे में यह जनकथा प्रचलित है कि मंगल ग्रह की उत्पत्ति यहीं से हुई थी। पुराणों के अनुसार उज्जैन नगरी को मंगल की जननी कहा जाता है।

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चौरासी महादेव में नवे स्थान पर आने वाले श्री स्वर्ग द्वारेश्वर महादेव (९/८४)

उज्जयिनी स्थित चौरासी महादेव में से एक श्री स्वर्गद्वारेश्वर महादेव की महिमा गणों और देवताओं के संघर्ष व देवताओं की स्वर्ग प्राप्ति से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथाओं के अनुसार श्री स्वर्गद्वारेश्वर के पूजन अर्चन से इंद्र समेत सभी देवताओं को स्वर्ग की प्राप्ति हुई थी।

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चौरासी महादेव में सातवें स्थान पर आने वाले श्री त्रिविष्टपेश्वर महादेव (७/८४)

चौरासी महादेव में से एक त्रिविष्टपेश्वर महादेव की स्थापना स्वयं देवताओं ने की है जो महाकाल वन की सुंदरता और महत्ता दर्शाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार देवऋषि नारद स्वर्गलोक में इंद्र देव के दर्शन करने गए। वहां इंद्र देव ने महामुनि नारद से महाकाल वन का माहात्म्य पूछा।

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चौरासी महादेव में आठवे, श्री कपालेश्वर महादेव (८/८४)

उज्जयिनी स्थित चौरासी महादेव में से एक श्री कपालेश्वर महादेव की महिमा के साक्षी स्वयं महादेव हैं। श्री कपालेश्वर महादेव की आराधना कर स्वयं महादेव का ब्रम्ह हत्या दोष निवारण हुआ।

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भगवान श्री कृष्ण का शिक्षा स्थान, उज्जैन स्थित गुरु सांदीपनि आश्रम

उज्जैन स्थित महर्षि सांदीपनि आश्रम ऋषि संदीपनी की तप स्थली है। यहां महर्षि ने घोर तपस्या की थी। इसी स्थान पर महर्षि सांदीपनि ने वेद, पुराण, शास्त्रादि की शिक्षा हेतु आश्रम का निर्माण करवाया था। महाभारत, श्रीमद्भागवत, ब्रम्ह्पुराण, अग्निपुराण तथा ब्रम्हवैवर्तपुराण में सांदीपनि आश्रम का उल्लेख मिलता है।

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सांस्कृतिक परंपराओं का संवर्धन करने वाले हिंदुत्व के परिचायक विभिन्न अखाड़े

दशनामी साधु समाज अखाड़े: दशनामी साधु समाज के ७ प्रमुख अखाड़े हैं। इनमें से हर अखाड़े का अपना स्वतंत्र संगठन है। इनका अपना निजी लवाजमा होता है, जिसमें भगवा निशान, डंका, छड़ी, भाला, वाद्य, हाथी-घोड़े, पालकी आदि होते हैं। इन अखाड़ों का पृथक पृथक विवरण इस प्रकार है

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उज्जयिनी स्थित चौरासी महादेव में से एक श्री अनादिकल्पेश्वर महादेव (५/८४)

पुराणानुसार श्री रूद्र परमात्मा देवाधिदेव महादेव अनादिकल्पेश्वर महादेव के बारे में माता पार्वती को बताते हैं। वे कहते हैं यह लिंग कल्प से भी पहले प्रकट हुआ है। उस समय अग्नि, सूर्य, पृथ्वी, दिशा, आकाश, वायु, जल,चंद्रग्रह, देवता, असुर, गन्धर्व,पिशाच आदि भी नहीं थे।

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जानिये चौरासी महादेव में से एक डमरुकेश्वर महादेव के बारे में ४/८४

चौरासी महादेव में से एक डमरुकेश्वर महादेव की पौराणिक गाथा रूद्र नाम के एक महाअसुर और उसके पुत्र वज्रासुर से शुरू होती है। वज्रासुर महाबाहु तथा बलिष्ठ था। शक्तियां अर्जित करने वाले इस महाअसुर के दांत तीक्ष्ण थे और इसने अपनी शक्तियों के बल पर देवताओं को उनके अधिकार से विमुख कर दिया एवं उनके संसाधनों पर कब्जा कर उन्हें स्वर्ग से निकाल दिया।

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उज्जैन स्थित रहस्यमयी और चमत्कारिक श्री काल भैरव मंदिर

उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक श्री काल भैरव मंदिर भारत की एक अद्भुत विरासत है जो सनातन पौराणिकता को प्रमाणित करती है। यहां विराजित श्री काल भैरव की प्रतिमा अथाह मदिरा अथवा सुरा पान करती है।

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१०७ वर्ष पुराने अद्भुत श्री बड़े गणपति, उज्जैन

अवंतिका स्थित श्री बड़े गणपति मंदिर महाकाल मंदिर के पास महाकाल घाटी पर प्रवचन हाल के ठीक सामने स्थित है। ऐसा कहा जाता है कि भारत में गणतंत्र की प्राप्ति के लिए उज्जैन में बड़े गणपति की स्थापना हुई जो कि श्रेष्ठ मुहूर्त माघ कृष्ण चतुर्थी बुधवार दिनांक २२ जनवरी १९०८ को महर्षि गुरु महाराज सिद्धांत वागेश पं. नारायणजी व्यास द्वारा की गई।

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श्री चारधाम मंदिर, नाम से ही इस मंदिर की विशिष्टता है

श्री स्वामी परमानंद गिरी जी महाराज के घनिष्ट शिष्य श्री स्वामी शांति स्वरूपानंद गिरी जी महाराज ने अखंड आश्रम ट्रस्ट के माध्यम से चारधाम मंदिर की नींव रखी । श्री द्वारकाधाम तथा जगन्नाथधाम की स्थापना सन् १९९७ और श्री रामेश्वरधाम की प्राण प्रतिष्ठा सन् १९९९ में हुई है । चौथे धाम श्री बद्रीविशाल की प्राण प्रतिष्ठा सन् २००० में हुई ।

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अवंतिका के प्रसिद्ध श्री चिंतामण गणेश मंदिर की महिमा

अवंतिका के प्रसिद्ध श्री चिंतामण गणेश मंदिर में श्री गणेश के तीन रूपों की प्रतिमा बहुत प्राचीन है और यह चिंतामण गणेश प्रतिमा माता सीता द्वारा स्थापित षट् विनायकों में से एक है । पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब भगवान श्री राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ अवंतिका खंड के महाकाल वन में प्रवेश किया था तब अपनी यात्रा की निर्विघ्नता के लिए षट् विनायकों की स्थापना की थी । उन षट् विनायकों में से एक विनायक भगवान चिंतामण गणेश हैं ।

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उज्जैन स्थित भव्य श्री हरसिद्धि मंदिर भारत के प्राचीन स्थानों में से एक

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार माता सती के पिता दक्षराज ने विराट यज्ञ का भव्य आयोजन किया था जिसमें उन्होंने सभी देवी-देवता व गणमान्य लोगों को आमंत्रित किया । परन्तु उन्होंने माता सती व भगवान शिवजी को नहीं बुलाया । फिर भी माता सती उस यज्ञ उत्सव में उपस्थित हुईं । वहां माता सती ने देखा कि दक्षराज उनके पति देवाधिदेव महादेव का अपमान कर रहे थे ।

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जानिए चौरासी महादेव में से एक ढुंढेश्वर महादेव के बारे में ३/८४

ढूँढ़ेश्वर महादेव मंदिर अवंतिका के प्रसिद्ध रामघाट के पास एक धर्मशाला के ऊपरी भाग पर स्थित है । पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कैलाश पर्वत पर ढूंढ नामक गणनायक था जो कि कामी और दुराचारी था।

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जानिये चौरासी महादेव में से एक गुहेश्वर महादेव के बारे में 2/84

उज्जयिनी स्थित चौरासी महादेव में से एक गुहेश्वर महादेव का मंदिर रामघाट पर पिशाच मुक्तेश्वर के पास सुरंग के भीतर स्थित है । इनके दर्शन मात्र से उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है । गुहेश्वर महादेव की स्थापना की कहानी ऋषि मंकणक, उनके अभिमान और फिर उनकी तपस्या से जुडी हुई है।

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जानिये चौरासी महादेव में से एक अगस्त्येश्वर महादेव के बारे में १/८४

अवंतिका स्थित चौरासी महादेव में से एक अगस्त्येश्वर महादेव मंदिर हरसिद्धि मंदिर के पीछे स्थित संतोषी माता मंदिर परिसर में है । पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख के अनुसार जब दैत्यों ने देवताओं पर विजय प्राप्त कर ली तब निराश होकर देवता पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे । वन में भटकते हुए एक दिन उन्होंने सूर्य के सामान तेजस्वी अगस्त्येश्वर ऋषि को देखा ।

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